Faiz Ahmad Faiz Shayari | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बेहतरीन शेर

Faiz Ahmad Faiz Shayari | फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बेहतरीन शेर

Faiz Ahmad Faiz Shayari की दुनिया का वो सितारा जो जिसे सारी दुनिया आज भी याद करती और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के शेर और नग्मे आज भी गुनगुनाती है।

एक अमीर ज़मींदार घर में फैज़ अहमद फैज़ का जन्म 13 फ़रवरी 1911 में हुआ था।  फ़ैज़ा अहमद ने अपनी प्रारभिक शिक्षा उर्दू, फ़ारसी और अरेबिक भाषाओँ में हासिल की थी।  अरेबिक भाषा में ही उन्होंने बाद में स्नातक की डिग्री भी ली।  इसके बाद उन्होंने इंग्लिश भाषा में मास्टरेट की भी डिग्री हासिल की । आप अच्छी तरह से समझ सकते हैं कि, पढ़ने लिखने में उनका रूझान कितना गहरा था।

पार्टीशन के बाद फैज़ अहमद फैज़ पाकिस्तान चले गए मगर भारत में उनके चाहने वाले और उनके मुरीदों की संख्या में कोई कमी नहीं आयी। Faiz Ahmad Faiz Shayari आज भी हिन्दुस्तान और तमाम देशों में बहोत ही प्यार से सुनी कही जाती है।

Faiz Ahmad Faiz Shayari और फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बेहतरीन शेर और फ़ैज़ा अहमद फैज़ की ग़ज़लें हर दौर और हर वक्त पे मुनासिब बैठते हैं और आगे भी बैठते रहेंगे। उनकी विचारधारा को लेकर कोई भी बात कहे बिना, मैं सिर्फ इतना कहूंगा, कि, Faiz Ahmad Faiz ने जब जो कहा, सच और सही कहा।

Faiz Ahemad Faiz shayayri
Faiz Ahemad Faiz Shayari

Faiza Ahmad का देहांत 1984 में हुआ और इस दुनिया ने एक बहोत ही उम्दा शायर और इंसान खो दिया।

आइये Faiz Ahmad Faiz Shayari के इस पोस्ट में हम फैज़ की शायरी, उनके शेरों के बेमिसाल अंदाज़ और Faiz Ahmad Faiz Ghazal से अपनी रूह को सुकून दें उनके अल्फ़ाज़ों के सहारे।

Faiz Ahmad Faiz Shayari

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Faiz Ahmad Faiz Shayari In Hindi

उठकर तो आ गये हैं तेरी बज्म से मगर
कुछ दिल ही जानता है कि किस दिल से आये हैं

Uthkar to aa gaye teri bajm se magar
Kuchh dil hi jaanta hai ki kis dil se aaye hain

वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था
वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है

Wo baat saare fasaane men jis ka zikra na tha
Wo baat un ko bahut na-gavar gujri hai

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

Kab thhaharega dard aye dil kab raat basar hogi
Sunte thhe woh aenge sunate the sahar hogi

आए कुछ अब्र कुछ शराब आए
इस के ब’अद आए जो अज़ाब आए

Aye kuchh abr kuchh sharaab aaye
Is k b’ad aye jo azab aaye

शाम-ए-फ़िराक़ अब न पूछ आई और आ के टल गई
दिल था कि फिर बहल गया जाँ थी कि फिर सँभल गई

Shaam-e-firaq ab na pooch i or a k tall gayi
Dil tha ki fir bahal gaya jaan thi ki fir sambhal gai

Faiz Ahmad Faiz Shayari In Hindi

shayari of faiz ahmad faiz
Faiz Ahmed Faiz Shayari On Life

दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है
लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है

Dil Naummeed to nahi, naakaam hi to hai
Labi hai gham ki shaam magar, shaam hi to hai

हर सदा पर लगे हैं कान यहाँ
दिल सँभाले रहो ज़बाँ की तरह

Har sada per lage hain conn yahaan
Dil snbhaale raho zabaan ki tarah

ये दाग़ दाग़ उजाला ये शब-गज़ीदा सहर
वो इंतिज़ार था जिस का ये वो सहर तो नहीं

Ye daag daag ujala ye shab-gazida sahar
Wo intizaar tha jis ka ye wo sahar to nahin

अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें
दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमे तो बात करें

Ab jo koi puchhe bhi to us se kya sharah-a-halat karen
Dil thhahare to dard sunaaen dard thame toh baat karen

न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ
इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं

Na jaane kis liye ummid-war baithha hun
Ek aisi raah pe jo teri rehguzar bhi nahin

क़फ़स उदास है यारो सबा से कुछ तो कहो
कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले

Kafas udaas hai yaaro saba se kuchh to kaho
Kahin to bahar-e-khuda aaj zikra-e-yaar chale

Top 10 Faiz Ahmad Faiz Shayari

  • और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
    राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
  • Aur bhi dukh hain zamaane men mohabbat ke siva
    Raahaten aur bhi hain wasl ki rahat ke siva
  • अब के ख़िज़ाँ ऐसी ठहरी वो सारे ज़माने भूल गए
    जब मौसम-ए-गुल हर फेरे में आ आ के दोबारा गुज़रे था
  • Ab ke khizaan aisi thahari
    Wo saare zamaane bhool gaye
    Jab mausam-e-gul har phere mein
    Aa aa ke dobara gujre tha
  • कब तक दिल की ख़ैर मनाएँ कब तक रह दिखलाओगे
    कब तक चैन की मोहलत दोगे कब तक याद न आओगे
  • Kab tak dil ki khair manaaen kab tak rah dikhalaaoge
    Kab tak chain ki mohalat doge kab tak yaad na aoge
  • जब तुझे याद कर लिया सुब्ह महक महक उठी
    जब तिरा ग़म जगा लिया रात मचल मचल गई
  • Jab tujhe yaad kar liya subh mahak mahak uthi
    Jab tira gm jaga liya raat machal machal gai
  • इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा
    इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए
  • Ek gul ke murjhane par kya gulshan mein kohram macha
    Ek chehara kumhala jaane se kitane dil nashad hue
  • फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं
    फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम
  • Fir nazar mein fool mahake dil mein fir shamen jalin
    Fir tasavvur ne liya us bazm mein jaane ka naam
  • अब अपना इख़्तियार है चाहे जहाँ चलें
    रहबर से अपनी राह जुदा कर चुके हैं हम
  • Ab apana ikhtiyar hai chaahe jahan chalen
    Rahbar se apani raah juda kar chuke hain hum
  • चलो ‘फ़ैज़’ दिल जलाएँ करें फिर से अर्ज़-ए-जानाँ
    वो सुख़न जो लब तक आए पर सवाल तक न पहुँचे
  • Chalo ‘faiz’ dil jalaaen karen fir se ears-e-jaanaan
    Wo sukhan jo lab tak aaye par sawal tak na pahunche
  • ‘फ़ैज़’ थी राह सर-ब-सर मंज़िल
    हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए
  • ‘Faiz’ the rah sar-b-sir manzil
    Hum jahan pahunche kamyab aaye
  • हम सहल-तलब कौन से फ़रहाद थे लेकिन
    अब शहर में तेरे कोई हम सा भी कहाँ है
  • Hum sahal-talab kaun se farhad the lekin
    Ab sheher mein tere koi hum sa bhi kahaan hai

Faiz Ahmad Faiz Two Line Shayari

फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ शायरी, faiz ahmed faiz love poetry in english
Faiz Ahmad Faiz Poetry

कटते भी चलो बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहुत हैं सर भी बहुत
चलते भी चलो कि अब डेरे मंज़िल ही पे डाले जाएँगे

Katate bhi chalo badhte bhi chalo
Baazu bhi bahut hain sar bhi bahut
Chalte bhi chalo ki ab dere
Manzil hi pe daale jaaenge

Faiz Poetry On Love

तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है

Teri soorat se hai aalam me baharon ko sawal
Teri aankho ke siwa duniya mein rakkha kya hai

जुदा थे हम तो मयस्सर थीं क़ुर्बतें कितनी
बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाइयाँ क्या क्या

Judaa the hum toh mayassar thin kurbaten kitni
Baham hue to padi hain judaaiyaan kya kya

Read Ahmad Faraz Shayari

faiza ahmad faiz
Faiz Ki Shayari In Hindi

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

Kab thhaharega dard aye dil kab raat basar hogi
Sunte thhe woh aenge sunate the sahar hogi

दिल से तो हर मोआमला कर के चले थे साफ़ हम
कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई

Dil se to har moamala kar ke chale the saf hum
Kahane men un ke saamne baat badal badal gayi

Faiz Ahmed Faiz Quotes On Love

है वही बात यूँ भी और यूँ भी
तुम सितम या करम की बात करो

Hai wahi baat yun bhi aur yun bhi
Tum sitam ya karam ki baat karo

Shayari Of Faiz Ahmad Faiz

faiz ahmed faiz poetry in hindi
फैज़ अहमद फैज़ शायरी इन हिंदी

इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन
देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के

Ik fursat-a-gunah milly woh bhi chaar din
Dekhe hain hum ne housley parvardigar k

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

Gar baazi ishq ki baazi hai jo chaaho laga do dar kaisa
Gar jeet ge to kya kehna hare bhi to baazi maat nahin

हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

Hum paravarish-a-loh-o-kalam karte rahenge
Jo dil pe gujarati hai rakam karte rahenge

नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही
नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही

Nahin nigaah men manzil to justuju hi sahi
Nahi visal mayassar to arzu hi sahi

बे-दम हुए बीमार दवा क्यूँ नहीं देते
तुम अच्छे मसीहा हो शिफ़ा क्यूँ नहीं देते

Be-dam hue bimar dava kyun nahi dete
Tum achchhe masiha ho shifa kyun nahi dete

Best Shayari Of Faiz Ahmad Faiz

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Faiz Ahmed Faiz Quotes

अदा-ए-हुस्न की मासूमियत को कम कर दे
गुनाहगार-ए-नज़र को हिजाब आता है

Ada-ae-husn ki masumiyat ko kam kar de
Gunahgar-e-nazar ko hijab aata hai

आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबान
भूले तो यूँ कि गोया कभी आश्ना न थे

Aye to yun ki jaise hamesha the meharbaan
Bhoole to yun ki goya kabhi ashna na the

Faiz Ahmad Faiz Ki Ghazal

आप की याद आती रही रात भर
चाँदनी दिल दुखाती रही रात भर

गाह जलती हुई गाह बुझती हुई
शम-ए-ग़म झिलमिलाती रही रात भर

कोई ख़ुशबू बदलती रही पैरहन
कोई तस्वीर गाती रही रात भर

फिर सबा साया-ए-शाख़-ए-गुल के तले
कोई क़िस्सा सुनाती रही रात भर

जो न आया उसे कोई ज़ंजीर-ए-दर
हर सदा पर बुलाती रही रात भर

एक उम्मीद से दिल बहलता रहा
इक तमन्ना सताती रही रात भर

फैज़ अहमद फैज़ की मशहूर ग़ज़ल “कब ठहरेगा दर्द ऐ  दिल”

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी

कब जान लहू होगी कब अश्क गुहर होगा
किस दिन तिरी शुनवाई ऐ दीदा-ए-तर होगी

कब महकेगी फ़स्ल-ए-गुल कब बहकेगा मय-ख़ाना
कब सुब्ह-ए-सुख़न होगी कब शाम-ए-नज़र होगी

वाइ’ज़ है न ज़ाहिद है नासेह है न क़ातिल है
अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी

कब तक अभी रह देखें ऐ क़ामत-ए-जानाना
कब हश्र मुअ’य्यन है तुझ को तो ख़बर होगी

 Faiz Ahmad Faiz Ghazal

तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं

हदीस-ए-यार के उनवाँ निखरने लगते हैं
तो हर हरीम में गेसू सँवरने लगते हैं

हर अजनबी हमें महरम दिखाई देता है
जो अब भी तेरी गली से गुज़रने लगते हैं

सबा से करते हैं ग़ुर्बत-नसीब ज़िक्र-ए-वतन
तो चश्म-ए-सुब्ह में आँसू उभरने लगते हैं

वो जब भी करते हैं इस नुत्क़ ओ लब की बख़िया-गरी
फ़ज़ा में और भी नग़्मे बिखरने लगते हैं

दर-ए-क़फ़स पे अँधेरे की मोहर लगती है
तो ‘फ़ैज़’ दिल में सितारे उतरने लगते हैं

फैज़ की ग़ज़ल 

कब याद में तेरा साथ नहीं कब हात में तेरा हात नहीं
सद-शुक्र कि अपनी रातों में अब हिज्र की कोई रात नहीं

मुश्किल हैं अगर हालात वहाँ दिल बेच आएँ जाँ दे आएँ
दिल वालो कूचा-ए-जानाँ में क्या ऐसे भी हालात नहीं

जिस धज से कोई मक़्तल में गया वो शान सलामत रहती है
ये जान तो आनी जानी है इस जाँ की तो कोई बात नहीं

मैदान-ए-वफ़ा दरबार नहीं याँ नाम-ओ-नसब की पूछ कहाँ
आशिक़ तो किसी का नाम नहीं कुछ इश्क़ किसी की ज़ात नहीं

गर बाज़ी इश्क़ की बाज़ी है जो चाहो लगा दो डर कैसा
गर जीत गए तो क्या कहना हारे भी तो बाज़ी मात नहीं

आइए फैज़ अहमद फैज़ की कुछ नज़्में देखते हैं। 

मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग
मैं ने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात
तेरा ग़म है तो ग़म-ए-दहर का झगड़ा क्या है
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात
तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूँ हो जाए
यूँ न था मैं ने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाए
और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा

अन-गिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म
रेशम ओ अतलस ओ कमख़ाब में बुनवाए हुए
जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म
ख़ाक में लुथड़े हुए ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से
पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे
अब भी दिलकश है तिरा हुस्न मगर क्या कीजे

और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा
मुझ से पहली सी मोहब्बत मिरी महबूब न माँग

और फैज़ अहमद फैज़ के बेशुमार नज़्मों में से ये मेरी सबसे पसंदीदा नज़्म है, गौर फरमाएं

Faiz Ahmad Faiz Nazm

निसार मैं तिरी गलियों के ऐ वतन कि जहाँ
चली है रस्म कि कोई न सर उठा के चले
जो कोई चाहने वाला तवाफ़ को निकले
नज़र चुरा के चले जिस्म ओ जाँ बचा के चले
है अहल-ए-दिल के लिए अब ये नज़्म-ए-बस्त-ओ-कुशाद
कि संग-ओ-ख़िश्त मुक़य्यद हैं और सग आज़ाद

बहुत है ज़ुल्म के दस्त-ए-बहाना-जू के लिए
जो चंद अहल-ए-जुनूँ तेरे नाम-लेवा हैं
बने हैं अहल-ए-हवस मुद्दई भी मुंसिफ़ भी
किसे वकील करें किस से मुंसिफ़ी चाहें
मगर गुज़ारने वालों के दिन गुज़रते हैं
तिरे फ़िराक़ में यूँ सुब्ह ओ शाम करते हैं

बुझा जो रौज़न-ए-ज़िंदाँ तो दिल ये समझा है
कि तेरी माँग सितारों से भर गई होगी
चमक उठे हैं सलासिल तो हम ने जाना है
कि अब सहर तिरे रुख़ पर बिखर गई होगी
ग़रज़ तसव्वुर-ए-शाम-ओ-सहर में जीते हैं
गिरफ़्त-ए-साया-ए-दीवार-ओ-दर में जीते हैं

यूँही हमेशा उलझती रही है ज़ुल्म से ख़ल्क़
न उन की रस्म नई है न अपनी रीत नई
यूँही हमेशा खिलाए हैं हम ने आग में फूल
न उन की हार नई है न अपनी जीत नई
इसी सबब से फ़लक का गिला नहीं करते
तिरे फ़िराक़ में हम दिल बुरा नहीं करते

गर आज तुझ से जुदा हैं तो कल बहम होंगे
ये रात भर की जुदाई तो कोई बात नहीं
गर आज औज पे है ताला-ए-रक़ीब तो क्या
ये चार दिन की ख़ुदाई तो कोई बात नहीं
जो तुझ से अहद-ए-वफ़ा उस्तुवार रखते हैं
इलाज-ए-गर्दिश-ए-लैल-ओ-नहार रखते हैं

दोस्तों, कैसी लगी Faiz Ahmad Faiz Shayari, की ये पोस्ट आप सबको? मज़ा आ गया न फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ के बेहतरीन शेर, शायरी, ग़ज़ल और नज़्मों से गुज़रते हुए?

यही खासियत फैज़ अहमद फैज़ को इतिहास में अमर कर देती है। इसी के साथ मैं वादा करता हूँ आप सबके लिए आगे भी कुछ और Faiz Ahmad Faiz Shayari अपडेट करता रहूंगा इसी पोस्ट पर।

अच्छी और दिल को छू लेने वाली हिंदी शायरी के लिए जुड़े रहिये मेरे साथ यहाँ। आपके वक़्त का बहोत बहोत शुक्रिया!

दर्दे दिल शायरी 

 

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